बुधवार, 16 जुलाई 2014

वह पत्थरिला डगर,

वह पत्थरिला डगर,
और अनजाना सफर

वही हवा की रूख,
उसी नदी का किनारा


दोनों तरफ कंटीले वृक्ष
बीच में अगाध प्रवाह,

नदी के उस पार तुम
और इस पार मैं..... ।

आज हम वही खडे हैं
जहाँ कल खडे थे.....

न कभी फासला बढा
न कभी कम् हुई थी.…

आज भी वही बातें, जो
कल हुआ करता था.…

फिर ..
कल क्या बात अलग थी
या आज काहाँ हम अलग हैं.


कॉपि राइट: लता तेजश्वर

लौट आए हैं हम

लौट आए हैं हम -
अपनी आसियाने में
सकुन भरी साँस दिल में लिए

वह बच्चा जो मिल गया था
कुछ दिन पहले, किसी मोड पर
आखों में आँसू लिए-

रूक गये थे कदम हमारी
कुछ देर के लिए
आज वह कदम लौट आए हैं .

कुछ देर के लिए ही सही
आँख भर आए थे-
उस नादान की दु:खडों पर,

जब वह अपना हाथ-
हमारी हाथों से छुडा रहा था
मौन रह तो गए थे,

पर सकून थी मन में की
आज वह सकून से
जी तो सकेगा .

ग़म नहीं होगा, उसके दिल पर
क्यों की जीने का बहाना जो
ढूँढ लिया है उसने.

© लता तेजेश्वर
Sun Mar 02 20:10:36 PST 2014
....लता तेज....******