रविवार, 17 नवंबर 2019

कस्तूरी

समय की ओज से पा लिया मैंने कस्तूरी
मेरे अंदर बसी थी ढूँढ लिया मैंने कस्तूरी

ढूँढ़ा मैंने गली-चौराह, बाग-पगडंडियाँ
नहीं मिला सूर्य-किरणों में न ही चाँदनी में
श्वास में भर बंद आँखों से एहसास किया 
मेरे दिल में ही पाया, मेरे मन की कस्तूरी।

सीने से लगकर वह आँचल में लिपट गयी 
हिरणी-सी बलखाती चंचल गुड़िया रानी
खुशी से छलक उठा नैन, तन-मन पुलकित 
मन की आँगन में जब पा लिया मैंने कस्तूरी।

©लता तेजेश्वर 'रेणुका'

देश की बेटी

किसान की बेटी अब देश की बेटी कहलाई
अपना वजूद को देश विदेश भर में बतलाई।

देख हिमा दास को हिम भी आज पिघल रहा
कहो इस कली को किस आँगन ने खिलाया।

जूते न थे पैर में जब धरती मुलायम बन गई
तकलुफ्फ में है दुनिया जो बेटी को फेंक आई।

नाज़ है तुम पर हिमा रोशनी इतना फैलाओ
कोई न कहे कि बेटी को क्यों रे! मेरे घर आई। 

©लता तेजेस्वर 'रेणुका'

मेरा सपना बड़ा हो रहा


एक सपना देखा था मैंने बचपन में
एक अखंड भारत का
मानवता और जुड़ाव का
उम्र बढ़ती गयी और 
मेरे सपने बिखरने लगे
बँटने लगे भाषा-संस्कृति
जाती और धर्म विशेष में
कोई कहता मेरा धर्म बड़ा है
कोई कहता मेरी जाति ऊँची है
कोई अपनी भाषा से बँटा
कोई अपनी संस्कृति से
तब एहसास हुआ 
भारत एक नहीं, एक में अनेक है।

मुझे अनेकता में भी एकता चाहिए
मुझे एक अखंड भारत चाहिए। 

मन में आया,
सभी जाति धर्म भाषाओं को एक कर दूँ
जैसे एक चक्र के अलग-अलग साँचे में 
अलग-अलग रंगों को डाल कर
घुमा दिया जाए तो
सफेद रंग का आभास होता है
वैसे ही सभी धर्म, भाषा, जाती को
एक चक्र में भर कर घुमा दिया जाए, 
जिससे मानवता का रंग निकल आएगा।

अगर वह चक्र मुझे बनना है
तो मुझे मंजूर है,
जिससे एक ही भाषा, 
धर्म और संस्कृति मिलेगी
और मानवता का संदेश होगा
वह होगा मेरा अखण्ड भारत 
मुझे उस अखंड भारत की प्रतीक्षा है।

© लता तेजेस्वर 'रेणुका'

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

चाँदनी रात में तुम -

चाँदनी रात में तुम
ओस में भीगती हुई,
सफेद लिबास में
सबनम की बूँद सी
जब क्यारी में
तितलियों के बीच
लहराती हो,
चंचल हिरनी सी
बलखाती हो-

मैं पलक
झपकाना भूल जाता हूँ,
चुपके से पेड़ के पीछे
छुप कर निहारता रहता हूँ,
न जाने कितने
बातें होठों पर
आते आते रहजाते हैं,
मन में तुम्हारे
सामने आने की
चाह, फिरभी चुप हो जाता हूँ,

डर लगता है,

कहीं सामने तुम्हारे आते ही
नींद न खुल जाए,
पल में ये सपना
टूट न जाए,
मुठ्ठी को बंद कर
सीने में थाम लेता हूँ,
लगता यूँ तुम मेरे करीब हो
बहूत ही करीब.


© लता तेजेश्वर
 (on: Fri Feb 28 03:49:59 PST 2014)
.....लता तेज......*******

बुधवार, 16 जुलाई 2014

वह पत्थरिला डगर,

वह पत्थरिला डगर,
और अनजाना सफर

वही हवा की रूख,
उसी नदी का किनारा


दोनों तरफ कंटीले वृक्ष
बीच में अगाध प्रवाह,

नदी के उस पार तुम
और इस पार मैं..... ।

आज हम वही खडे हैं
जहाँ कल खडे थे.....

न कभी फासला बढा
न कभी कम् हुई थी.…

आज भी वही बातें, जो
कल हुआ करता था.…

फिर ..
कल क्या बात अलग थी
या आज काहाँ हम अलग हैं.


कॉपि राइट: लता तेजश्वर

लौट आए हैं हम

लौट आए हैं हम -
अपनी आसियाने में
सकुन भरी साँस दिल में लिए

वह बच्चा जो मिल गया था
कुछ दिन पहले, किसी मोड पर
आखों में आँसू लिए-

रूक गये थे कदम हमारी
कुछ देर के लिए
आज वह कदम लौट आए हैं .

कुछ देर के लिए ही सही
आँख भर आए थे-
उस नादान की दु:खडों पर,

जब वह अपना हाथ-
हमारी हाथों से छुडा रहा था
मौन रह तो गए थे,

पर सकून थी मन में की
आज वह सकून से
जी तो सकेगा .

ग़म नहीं होगा, उसके दिल पर
क्यों की जीने का बहाना जो
ढूँढ लिया है उसने.

© लता तेजेश्वर
Sun Mar 02 20:10:36 PST 2014
....लता तेज....******

गुरुवार, 13 मार्च 2014

तेरा मेरा रिश्ता कुछ ऐसा था। …


गाँव की गली में वो  हरकतें  थी,
सूरज की लाली में वो नशा भी था -
महकती  हवा में खुशबू का पहरा था

घास की बगिया में सबनम की बुँदे थे,
तेरे होंठों पर मुस्कराहट
और मेरे साँसे बहके हुए थे .

कदम मेरे बहक रहे थे,
चंचल मन सरमा रहा था
दिल की धड़कने उफ्फां पर थी
और साँसे मेरे गरमा रह थे-

कैसे हुए सर्द हवा में ये रंगीन तस्वीरें ?
जो तस्वीर दिल में कभी बसा ही नहीं था,
उस तस्वीर को एक नज़र ही तो देखा था-
और मन में मेरे लाखों सवाल थे
जिनका न था जवाब
न था इंतज़ार .......
बस बेबस सा एक दिल था,
जिसके चारों ओर फूल ही फूल खेल रहे थे
उस फूलों की वादियों में-
एक खिलाता हुआ कमल लहराता था,
जिसकी श्क्ल खाश 
तुझसे मिलता जुलता था।
अचानक ही गायब हो गए सारे सितारे
गायब हो गए फूलों की वह वादियाँ
तन मन में लहराता हुआ एक आवाज़ रहगया,
पुकारते पुकारते थक सा गया 
सुनाने वाला कोई न था,
सिसकता हुआ वह आवाज़ धीरे धीरे 
खोने लगा।
ये तू नहीं था, तेरे चेहरा हँस रहा था,
बार बार तू सपनों में आता रहा,
कुछ बताने को कोशिश करता रहा -
पर पल में गायब हो जाता रहा .
मेरे करीब एक पुकार 
महसूस होता है हर पल -
मगर कोई न था जिसे अपना कह सकूँ,
मन में लाखों सवाल उठते रहते -
कौन है तू ?
कहाँ से आया है तू ?

ये कैसा एहसास है जो मुझे
तेरे करीब खिंच ले आती है,
चाहे जितना दूर जाने को कोशिश करूँ
एक झलक सी नज़र आती है .
कोई पुकारता है हर पल
हाथ बढाता रहता है,
पर न जाने मन में मेरे एक संकोच था -
कतराता रहा मेरा दिल,
तेरी उस स्नेह भरी हाथ को छूने से -

बार बार ये कहता रहा न आया करो 
पास मेरे, गिर पड़ेंगे मेरे आँसू
जो कई दिनों से संभाल रखा था
तेरे जुदाई में …

© Lata Tejeswar

composed on 9/8/2011