एक सपना देखा था मैंने बचपन में
एक अखंड भारत का
मानवता और जुड़ाव का
उम्र बढ़ती गयी और
मेरे सपने बिखरने लगे
बँटने लगे भाषा-संस्कृति
जाती और धर्म विशेष में
कोई कहता मेरा धर्म बड़ा है
कोई कहता मेरी जाति ऊँची है
कोई अपनी भाषा से बँटा
कोई अपनी संस्कृति से
तब एहसास हुआ
भारत एक नहीं, एक में अनेक है।
मुझे अनेकता में भी एकता चाहिए
मुझे एक अखंड भारत चाहिए।
मन में आया,
सभी जाति धर्म भाषाओं को एक कर दूँ
जैसे एक चक्र के अलग-अलग साँचे में
अलग-अलग रंगों को डाल कर
घुमा दिया जाए तो
सफेद रंग का आभास होता है
वैसे ही सभी धर्म, भाषा, जाती को
एक चक्र में भर कर घुमा दिया जाए,
जिससे मानवता का रंग निकल आएगा।
अगर वह चक्र मुझे बनना है
तो मुझे मंजूर है,
जिससे एक ही भाषा,
धर्म और संस्कृति मिलेगी
और मानवता का संदेश होगा
वह होगा मेरा अखण्ड भारत
मुझे उस अखंड भारत की प्रतीक्षा है।
© लता तेजेस्वर 'रेणुका'
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