समय की ओज से पा लिया मैंने कस्तूरी
मेरे अंदर बसी थी ढूँढ लिया मैंने कस्तूरी
ढूँढ़ा मैंने गली-चौराह, बाग-पगडंडियाँ
नहीं मिला सूर्य-किरणों में न ही चाँदनी में
श्वास में भर बंद आँखों से एहसास किया
मेरे दिल में ही पाया, मेरे मन की कस्तूरी।
सीने से लगकर वह आँचल में लिपट गयी
हिरणी-सी बलखाती चंचल गुड़िया रानी
खुशी से छलक उठा नैन, तन-मन पुलकित
मन की आँगन में जब पा लिया मैंने कस्तूरी।
©लता तेजेश्वर 'रेणुका'