रविवार, 17 नवंबर 2019

कस्तूरी

समय की ओज से पा लिया मैंने कस्तूरी
मेरे अंदर बसी थी ढूँढ लिया मैंने कस्तूरी

ढूँढ़ा मैंने गली-चौराह, बाग-पगडंडियाँ
नहीं मिला सूर्य-किरणों में न ही चाँदनी में
श्वास में भर बंद आँखों से एहसास किया 
मेरे दिल में ही पाया, मेरे मन की कस्तूरी।

सीने से लगकर वह आँचल में लिपट गयी 
हिरणी-सी बलखाती चंचल गुड़िया रानी
खुशी से छलक उठा नैन, तन-मन पुलकित 
मन की आँगन में जब पा लिया मैंने कस्तूरी।

©लता तेजेश्वर 'रेणुका'

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