वह पत्थरिला डगर,
और अनजाना सफर
वही हवा की रूख,
उसी नदी का किनारा
दोनों तरफ कंटीले वृक्ष
बीच में अगाध प्रवाह,
नदी के उस पार तुम
और इस पार मैं..... ।
आज हम वही खडे हैं
जहाँ कल खडे थे.....
न कभी फासला बढा
न कभी कम् हुई थी.…
आज भी वही बातें, जो
कल हुआ करता था.…
फिर ..
कल क्या बात अलग थी
या आज काहाँ हम अलग हैं.
कॉपि राइट: लता तेजश्वर
और अनजाना सफर
वही हवा की रूख,
उसी नदी का किनारा
दोनों तरफ कंटीले वृक्ष
बीच में अगाध प्रवाह,
नदी के उस पार तुम
और इस पार मैं..... ।
आज हम वही खडे हैं
जहाँ कल खडे थे.....
न कभी फासला बढा
न कभी कम् हुई थी.…
आज भी वही बातें, जो
कल हुआ करता था.…
फिर ..
कल क्या बात अलग थी
या आज काहाँ हम अलग हैं.
कॉपि राइट: लता तेजश्वर
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