बुधवार, 16 जुलाई 2014

वह पत्थरिला डगर,

वह पत्थरिला डगर,
और अनजाना सफर

वही हवा की रूख,
उसी नदी का किनारा


दोनों तरफ कंटीले वृक्ष
बीच में अगाध प्रवाह,

नदी के उस पार तुम
और इस पार मैं..... ।

आज हम वही खडे हैं
जहाँ कल खडे थे.....

न कभी फासला बढा
न कभी कम् हुई थी.…

आज भी वही बातें, जो
कल हुआ करता था.…

फिर ..
कल क्या बात अलग थी
या आज काहाँ हम अलग हैं.


कॉपि राइट: लता तेजश्वर

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