बुधवार, 12 मार्च 2014

इंतजार मैं.... तुम्हारी..


जब तुम आए थे गुलाब की एक शाख लेकर
कितने आश छुपी थी जो तुम्हारे मन में-
न जाने क्यों आँखें तुम्हारी नम हो रही थी बार बार,

समझ न पाई मैं कि वह तुम्हारी बिदाई की घडी थी
जो तुम्हारे ओंठों से जाहिर नहीं हो पा रही थी
वो मै भी तो पढ़ न पाई थी,
कितनी नादान थी मैं।

जब दर्द भऱे आवाज से तुम बोल रहे थे -
हम तो सोचे थे सर्द हवा का असर है,
हमें क्या पता था की हमसे जुदा हो रहे थे-

गुलाब के फूल देकर जब तुम चल पडे थे
हम ने भी तो रोका न था तुम्हें,
सोचा लौट आओगे रोज की तरह।

जब सालों बीत गए, इंतजार में तुम्हारे-
आज समझ गयी हूँ मैं, तुम्हारा मन के भावों को
आँसू भरे आँखों से -तुम जो न कह सके
और जो मैं समझ न सकी-

आज वही दिन आ गया है, जिस दिन
तुम आएथे फूल गुलाब के लेकर
प्यार का इजहार करने।

आज भी यह जानते हुए कि 
तुम नहीं आओगे, मेरे आँखे राह ताक रहे हैं,
वही गुलाब के शाख, आँख में पानी लिए तुम-

बस मेरे सामने खडे हो जाते हो बार बार,
न भूली मैं एक भी पल 
तुम्हारे साथ गुजारी हुई।

आज भी इंतजार है कि कभी न कभी
किसी न किसी मोड पर
आकर खडे हो जाओगे सामने हमारे-

इंतजार तो था ही...
लेकिन आज भी इंतजार है...
और सदियों तक ये इंतजार बरकरार रहेगा....


© लता तेजेश्वर

composed on:Dt- 04/02/2014

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